Tuesday, May 28, 2024

HCFC और CFC: एक विस्तृत जानकारी

 



HCFC और CFC: एक विस्तृत जानकारी

परिचय

हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFC) और क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) रसायन होते हैं जो व्यापक रूप से रेफ्रिजरेशन, एयर कंडीशनिंग, और अन्य औद्योगिक प्रक्रियाओं में उपयोग किए जाते हैं। इन रसायनों का वातावरण पर गहरा प्रभाव होता है, खासकर ओज़ोन परत पर।

CFC (क्लोरोफ्लोरोकार्बन)

CFC रसायनों का उपयोग 1930 के दशक में शुरू हुआ। ये रसायन अक्रिय, गैर-विषाक्त और गैर-दहनशील होते हैं, जिससे इन्हें रेफ्रिजरेंट और प्रोपेलेंट के रूप में व्यापक रूप से इस्तेमाल किया गया।

CFC के नुकसान:

1.     ओज़ोन परत की क्षति: CFC अणु वातावरण में उठते हैं और स्ट्रैटोस्फियर में पहुँचकर सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आते हैं। यह प्रक्रिया क्लोरीन अणुओं को मुक्त करती है, जो ओज़ोन (O3) को ऑक्सीजन (O2) में बदल देती है। इससे ओज़ोन परत पतली होती जाती है।

2.     ग्लोबल वार्मिंग: CFC ग्रीनहाउस गैस के रूप में भी काम करते हैं, जिससे पृथ्वी का तापमान बढ़ता है।

HCFC (हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन)

HCFC को CFC के विकल्प के रूप में विकसित किया गया। इसमें हाइड्रोजन अणु होते हैं जो इसे अधिक प्रतिक्रियाशील बनाते हैं और वातावरण में इसके जीवनकाल को कम करते हैं।

HCFC के लाभ:

1.     कम ओज़ोन-क्षति क्षमता: HCFC में ओज़ोन-क्षति क्षमता (ODP) CFC की तुलना में कम होती है।

2.     वातावरण में कम समय: HCFC का वातावरण में जीवनकाल कम होता है, जिससे यह जल्दी टूट जाता है और ओज़ोन परत पर कम प्रभाव डालता है।

HCFC के नुकसान:

1.     ग्रीनहाउस प्रभाव: हालांकि HCFC का ODP कम है, यह फिर भी ग्रीनहाउस गैस के रूप में कार्य करता है और ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देता है।

2.     विनाशकारी प्रभाव: यह भी अंततः ओज़ोन परत को नुकसान पहुँचाता है, भले ही CFC से कम हो।

निष्कर्ष

HCFC और CFC दोनों ही ओज़ोन परत और पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं। हालांकि HCFC को एक अस्थायी समाधान के रूप में पेश किया गया था, वैज्ञानिक और औद्योगिक समुदाय अब और अधिक पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों की ओर देख रहे हैं। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल जैसे अंतर्राष्ट्रीय समझौते इन रसायनों के उपयोग को नियंत्रित करने और उनके प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हमें सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के लिए वैकल्पिक और हरित प्रौद्योगिकियों की दिशा में प्रयास जारी रखने की आवश्यकता है।

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Understanding HCFCs and CFCs: Environmental Impact and Regulation

 





Understanding HCFCs and CFCs: Environmental Impact and Regulation

Introduction

Hydrochlorofluorocarbons (HCFCs) and Chlorofluorocarbons (CFCs) are both classes of chemical compounds that have played significant roles in various industrial applications, particularly as refrigerants, propellants in aerosol applications, and solvents. Despite their widespread use, both HCFCs and CFCs have severe environmental impacts, particularly on the ozone layer and global warming. This article delves into the characteristics, uses, environmental effects, and regulatory measures associated with these compounds.

What are HCFCs and CFCs?

CFCs (Chlorofluorocarbons):

·        Composition: Composed of chlorine, fluorine, and carbon atoms.

·        Uses: Historically used in refrigeration, air conditioning, foam blowing agents, and as propellants in aerosol cans.

·        Properties: Non-flammable, chemically stable, and non-toxic, making them initially ideal for a variety of applications.

HCFCs (Hydrochlorofluorocarbons):

·        Composition: Similar to CFCs but include hydrogen atoms, making them less stable in the atmosphere.

·        Uses: Introduced as temporary replacements for CFCs due to their lower ozone depletion potential (ODP).

·        Properties: Also non-flammable and less chemically stable than CFCs, leading to a shorter atmospheric lifetime.

Environmental Impact

Ozone Depletion:

·        Mechanism: Both HCFCs and CFCs release chlorine atoms when they break down in the stratosphere. These chlorine atoms then catalytically destroy ozone (O3) molecules.

·        Consequences: The depletion of the ozone layer results in increased ultraviolet (UV) radiation reaching the Earth's surface, which can cause skin cancer, cataracts, and adverse effects on ecosystems and wildlife.

Global Warming:

·        Global Warming Potential (GWP): Both HCFCs and CFCs are potent greenhouse gases. CFCs, in particular, have a much higher GWP compared to carbon dioxide (CO2), contributing significantly to global warming.

·        Transition to Alternatives: While HCFCs were considered as intermediate replacements to reduce ozone depletion, they still contribute to global warming, albeit less than CFCs.

Regulatory Measures

Montreal Protocol:

·        Adoption: Established in 1987, the Montreal Protocol is an international treaty designed to phase out the production and consumption of ozone-depleting substances (ODS).

·        Impact: The protocol has been successful in reducing the global production of CFCs and is now targeting the phase-out of HCFCs.

Kigali Amendment:

·        Purpose: An extension of the Montreal Protocol, adopted in 2016, it aims to phase down hydrofluorocarbons (HFCs), which are used as replacements for HCFCs and CFCs but are potent greenhouse gases.

·        Implementation: The amendment mandates the gradual reduction in the production and consumption of HFCs with specific targets and timelines for different groups of countries.

National Regulations:

·        Examples: Many countries have implemented additional regulations to control the use and emission of HCFCs and CFCs. For instance, the United States Environmental Protection Agency (EPA) has regulations under the Clean Air Act to manage these substances.

Transition to Sustainable Alternatives

Natural Refrigerants:

·        Examples: Ammonia (NH3), carbon dioxide (CO2), and hydrocarbons (e.g., propane, isobutane).

·        Advantages: These substances have low or zero ODP and GWP, making them environmentally friendly alternatives.

HFOs (Hydrofluoroolefins):

·        Characteristics: HFOs have low GWP and zero ODP. They are increasingly being used as refrigerants in new systems.

·        Challenges: The adoption of HFOs requires modifications in existing systems and compliance with safety standards due to their mildly flammable nature.

Conclusion

The transition away from HCFCs and CFCs is crucial for protecting the ozone layer and mitigating climate change. International treaties like the Montreal Protocol and its Kigali Amendment, along with national regulations, have been pivotal in this effort. The future lies in sustainable alternatives that offer environmental benefits without compromising efficiency and safety. Continued global cooperation and innovation in this field are essential to ensure a healthier planet for future generations

 

Monday, May 27, 2024

समुद्री विवाद क्या है?

 समुद्री विवाद क्या है? 

समुद्री विवाद महासागरों, समुद्रों या तटीय क्षेत्रों में संसाधनों या अधिकारों को लेकर देशों या संस्थाओं के बीच संघर्ष या असहमति है।

ये विवाद समुद्री सीमाओं, विशेष आर्थिक क्षेत्रों (Exclusive Economic Zones- EEZ), मछली पकड़ने के अधिकार, तेल और गैस अन्वेषण, नेविगेशन मार्गों या प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर प्रतिस्पर्द्धी दावों के कारण उत्पन्न हो सकते हैं।

समुद्री विवादों में अक्सर जटिल कानूनी, ऐतिहासिक, राजनीतिक और आर्थिक कारक शामिल होते हैं और यदि राजनयिक वार्ता से इनका शांतिपूर्वक हल नहीं निकाला  गया तो ये तनाव, कानूनी कार्यवाही या यहाँ तक कि सैन्य टकराव का कारण भी बन सकते हैं।

विभिन्न राष्ट्रों के साथ भारत का क्या समुद्री विवाद है?

भारत और बांग्लादेश:

o बांग्लादेश ने 8 अक्तूबर, 2009 को भारत के साथ अपनी समुद्री सीमा को लेकर  समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (United Nations Convention on the Law of the Sea- UNCLOS) के तहत वार्ता शुरू की।

o इस संबंध में सुनवाई 18 दिसंबर, 2013 को हेग में संपन्न हुई, जिसमें भूमि सीमा टर्मिनस के लिये स्थान, क्षेत्रीय समुद्र का परिसीमन, EEZ और 200 समुद्री मील से अधिक महाद्वीपीय शेल्फ जैसे विभिन्न मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया।

o हेग में परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (Permanent Court of Arbitration- PCA) द्वारा सुनाया गया फैसला एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ।

o इसके तहत संयुक्त राष्ट्र अधिकरण ने बंगाल की खाड़ी में विवादित 25,602 वर्ग किमी. क्षेत्र में से 19,467 वर्ग किमी. क्षेत्र बांग्लादेश को सोंप  दिया।

o इसने भारत और बांग्लादेश के बीच प्रादेशिक समुद्र, EEZ और 200 नॉटिकल मील के भीतर एवं  उससे आगे महाद्वीपीय शेल्फ के बीच समुद्री सीमा रेखा को चिह्नित किया।

o फैसले के बाद बांग्लादेश की समुद्री सीमा 118,813 वर्ग किमी. तक बढ़ा दी गई है। प्रादेशिक समुद्र अपनी आधार रेखा से समुद्र की ओर 12 नॉटिकल मील (NM) तक विस्तृत होता है। विशेष आर्थिक क्षेत्र आधार रेखा से 200 नॉटिकल मील की दूरी तक फैला होता है। 

o इसके अतिरिक्त इस फैसले ने चटगाँव तट से 345 नॉटिकल मील तक फैले महाद्वीपीय शेल्फ में समुद्र तल के संसाधनों पर बांग्लादेश के संप्रभु अधिकारों को मान्यता दी।

भारत और श्रीलंका:

o हिंद महासागर की गतिशीलता विशेष रूप से दक्षिण एशिया के लिये महत्त्वपूर्ण आर्थिक और राजनीतिक निहितार्थ रखती है, यह ऐतिहासिक रूप से सत्ता संघर्ष को लेकर युद्धरत क्षेत्र रहा है।

o इसकी रणनीतिक स्थिति को देखते हुए हिंद महासागर में किसी  भी प्रकार की अस्थिरता भारत की सुरक्षा के लिये खतरा पैदा करती है।

o भारत और श्रीलंका समुद्री सीमाएँ साझा करते हैं तथा  वर्ष 1974 एवं 1976 में समुद्री समझौतों पर हस्ताक्षर करने के बावजूद समुद्री मुद्दे अभी भी बने हुए हैं।

o यह मुद्दा पाक खाड़ी क्षेत्र में एक छोटे से निर्जन द्वीप कच्चातिवु के आस-पास केंद्रित  है।

o जबकि भारत इस द्वीप पर श्रीलंकाई संप्रभुता को स्वीकार करता है, हालाँकि मछली पकड़ने के उद्देश्य से भारतीय मछुआरों को प्रतिबंधित क्षेत्र में पहुँच की अनुमति देने हेतु कुछ व्यवस्थाएँ की गई थीं।

o वर्ष 1974 और 1976 के समझौते स्पष्ट रूप से भारतीय मछुआरों को भारतीय समुद्री क्षेत्र से परे मछली पकड़ने से प्रतिबंधित नहीं करते हैं, हालाँकि मछली पकड़ने से संबंधित क्षेत्र के अपने हिस्से पर श्रीलंका के संप्रभु अधिकार निर्विवाद हैं।

o यह मुद्दा अत्यधिक संवेदनशील है क्योंकि इसका सीधा असर बड़ी संख्या में मछुआरों की आजीविका पर पड़ता है।

o सेतु समुद्रम शिप चैनल प्रोजेक्ट: प्रगति में बाधक एक और समुद्री चुनौती सेतु समुद्रम शिप चैनल प्रोजेक्ट को लागू करने में देरी है। इस परियोजना का उद्देश्य विभिन्न आकार के जहाज़ों को समायोजित करने के लिये एडम ब्रिज, पाक खाड़ी के खंडों और पाक जलडमरूमध्य के माध्यम से ड्रेजिंग (Dredging) एवं खुदाई करके एक नौगम्य जहाज़ चैनल का निर्माण करना है।

यह परियोजना भारत सरकार द्वारा वर्ष 2004 में शुरू की गई थी जिसे वर्ष 2014 में पुनर्जीवित किया गया था।

o वर्ष 2010 में SAARC की वार्ता में समुद्री सुरक्षा और समुद्री डकैती से संबंधित मुद्दों को शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया था। भारत तथा श्रीलंका दोनों के लिये आसपास के समुद्री वातावरण का राष्ट्रीय हित में महत्त्वपूर्ण योगदानरहा है।

o सार्क के बीच समुद्री सहयोग की धीमी प्रगति को देखते हुए भारत और श्रीलंका के बीच समुद्री मुद्दों को दोनों देशों द्वारा द्विपक्षीय आधार पर हल किया जाना चाहिये।

o दोनों देशों को समुद्री सुरक्षा, समुद्री डकैती जैसे मुद्दों को लेकर  नौसैनिक सहयोग जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए ऐसे मुद्दों को हल करने हेतु एक तंत्र स्थापित करना चाहिये।

भारत और चीन: 

o चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का विस्तार किया है जिससे भारत की चिंताएँ बढ़ गई हैं।

o चीन का तर्क है कि क्षेत्र में उसकी गतिविधियाँ व्यावसायिक हितों और विदेशों में रह रहे उसके नागरिकों  की रक्षा पर केंद्रित हैं।

o चीन ने पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री डकैती विरोधी अभियानों का समर्थन करने के लिये बड़ी संख्या में नौसैनिक बलों को तैनात किया है और भारत के पड़ोसी देशों में निवेश करने के साथ ही वह उन्हें हथियार की आपूर्ति करता है।

o चीन का मुख्य उद्देश्य बंदरगाहों की सुरक्षा सुनिश्चित  करने के लिये हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के साथ आर्थिक और निवेश परियोजनाओं पर कब्ज़ा करना है जहाँ उसके सैन्य बल नौसैनिक सुविधाएँ स्थापित कर सकें।

o भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने और क्षेत्रीय विकास के लिये तथा  साथ ही क्षेत्र में चीन की बढ़ती भागीदारी  को कम करने हेतु हिंद महासागर क्षेत्र के समुद्री राज्यों के साथ राजनयिक, सुरक्षा और आर्थिक संबंध मज़बूत किये  हैं।

o भारत ने अपनी नौसेना, सैन्य अड्डे, आधुनिक बेड़े और उपकरण निर्माण एवंसुरक्षा संबंधों के विस्तार के लियेअरबों डॉलर का निवेश किया है।

o इसने दक्षिण चीन सागर में अपने जहाज़ तैनात किये हैं और अपनी एक्ट ईस्ट नीति के हिस्से के रूप में नेविगेशन की स्वतंत्रता तथा क्षेत्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का आह्वान किया है।

विश्व के अन्य प्रमुख समुद्री विवाद क्या हैं?

दक्षिण चीन सागर में प्रमुख विवाद:

o दक्षिण चीन सागर में क्षेत्रीय विवादों के अंतर्गत कई संप्रभु राज्यों, अर्थात् ब्रुनेई, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना, रिपब्लिक ऑफ चाइना (ताइवान), मलेशिया, फिलीपींस और वियतनाम के बीच द्वीप और समुद्री दोनों परदावे शामिल हैं।

o स्प्रैटली और पारासेल दोनों द्वीपों के साथ-साथ टोंकिन की खाड़ी में समुद्री सीमाओं को लेकर भी विवाद है।

o इंडोनेशियाई नतुना द्वीप समूह के निकट एक अन्य विवाद इसके जल को लेकर है।

o दोनों द्वीप समूहों के आस-पास मछली पकड़ने के क्षेत्रों का अधिग्रहण करना विभिन्न देशों के हित में है। 

दक्षिण चीन सागर के विभिन्न हिस्सों के समुद्र तल में संदिग्ध कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के संभावित दोहन को लेकर विवाद।

o दावेदार राज्य मछली पकड़ने, दक्षिण चीन सागर के विभिन्न हिस्सों के समुद्र तल में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खोज एवं संभावित दोहन तथा महत्त्वपूर्ण शिपिंग लेन के रणनीतिक नियंत्रण के अधिकार को बनाए रखने या प्राप्त करने में रुचि रखते हैं। 

o महत्त्वपूर्ण शिपिंग लेन का रणनीतिक नियंत्रण।

o शांगरी-ला डायलॉग दक्षिण चीन सागर में क्षेत्रीय विवादों सहित एशिया-प्रशांत क्षेत्र के आसपास के सुरक्षा मुद्दों पर "ट्रैक वन" एक्सचेंज फोरम के रूप में कार्य करता है।

o एशिया-प्रशांत में सुरक्षा सहयोग परिषद एशिया-प्रशांत के सुरक्षा मुद्दों पर "ट्रैक टू" डायलॉग/संवाद है।

इज़रायल और लेबनान:

o वर्ष 1948 में इज़रायल के निर्माण के बाद से लेबनान और इज़रायल आधिकारिक तौर पर युद्धरत हैं और दोनों देश भूमध्य सागर के लगभग 860 वर्ग किलोमीटर (330 वर्ग मील) पर दावा करते हैं।

o इस क्षेत्र में अपतटीय गैस क्षेत्रों पर इज़रायल और लेबनान के प्रतिस्पर्द्धी दावों के बीच दशकों से  तनाव बना है, जिसमें करिश गैस क्षेत्र और काना (Qana), एक संभावित गैस क्षेत्र का हिस्सा शामिल है।

इज़रायल द्वारा विकसित किये जा रहे करीश गैस क्षेत्र (Karish Gas Field) पर  ईरान द्वारा समर्थित लेबनान के शक्तिशाली राजनीतिक और उग्रवादी समूह हिज़्बुल्लाह (Hezbollah) का खतरा बना हुआ है।

o दोनों देशों ने वर्ष 2011 में भूमध्य सागर में ओवरलैपिंग सीमाओं की घोषणा की।

o चूँकि दोनों देश तकनीकी रूप से युद्ध की स्थिति में थे, इसलिये संयुक्त राष्ट्र को मध्यस्थता करने के लिये कहा गया।

एक दशक पहले इज़रायल द्वारा अपने तट पर दो गैस क्षेत्रों की खोज किये जाने के बाद इस मुद्दे को महत्त्व मिला, जो इसे ऊर्जा निर्यातक में परिवर्तित करने  में मदद कर सकता है।

ग्रीस और तुर्की:

o ग्रीस और तुर्की के बीच वर्ष 1973 से एजियन सागर को लेकर विवाद चल रहा है।

o एजियन सागर समुद्री विवाद में तीन मुख्य मुद्दे शामिल हैं: प्रादेशिक समुद्र की चौड़ाई, द्वीपों की उपस्थिति और दो राज्यों के बीच महाद्वीपीय शेल्फ का परिसीमन।

o वर्ष 1936 से ग्रीस ने 6 नॉटिकल मील क्षेत्रीय समुद्र का दावा किया है। तुर्की एजियन सागर में 6-NM प्रादेशिक समुद्र का भी दावा करता है। हालाँकि समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय 1982 (UNCLOS) राज्यों को अपने क्षेत्रीय समुद्र को तट से 12 NM तक बढ़ाने की अनुमति देता है।

o ग्रीस ने कन्वेंशन को अपनाया है, जबकि तुर्किये ने इसे नहीं अपनाया है और अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाया है।

o इस विवाद में क्षेत्रीय दावों के साथ ही हवाई क्षेत्र के दावे, महाद्वीपीय शेल्फ का उपयोग और पर्यटन शामिल हैं।

o कूटनीतिक कारणों के वज़ह से  विवाद और बढ़ गया है।

रूस और नॉर्वे:

o मछली पकड़ने के अधिकार को लेकर पहली बार विरोध की शुरुआत 1970 के दशक में हुई थी, लेकिन अब  इसका विस्तार संभावित तेल और गैस संसाधनों तक हो गया है। माना जाता है कि रूसी और नॉर्वेजियन दोनों क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण पेट्रोलियम भंडार हैं।

o यह विवाद दोनों देशों के बीच बैरेंट्स सागर में उनकी समुद्री सीमा को लेकर है, जो शिपिंग, तेल और मत्स्य पालन के लिये महत्त्वपूर्ण है।

यूरोपीय संघ और नॉर्वे:

o यह विवाद मछली पकड़ने के अधिकार को लेकर है। नॉर्वे का दावा है कि यूरोपीय संघ ने स्वतंत्र रूप से मछली पकड़ने के लाइसेंस जारी किये हैं और स्वालबार्ड के आसपास के जल में सदस्य राज्यों के लिये मछली पकड़ने का कोटा निर्धारित किया है, जो बिना पूर्व परामर्श के नॉर्वे तथा यूरोपीय संघ के बीच सहमत कोटा से अधिक है। इस कार्रवाई को 200 मील के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के भीतर संसाधनों के प्रबंधन के नॉर्वे के अधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखा जाता है, जैसा कि समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS) में उल्लिखित है।

UK और स्पेन: 

o जिब्राल्टर को लेकर ब्रिटेन और स्पेन के बीच विवाद है तथा स्पेन के निवासियों ने किसी भी साझा संप्रभुता व्यवस्था को अस्वीकार करने के लिये मतदान किया।

o ब्रिटेन जिब्राल्टर (Gibraltar) के आसपास के क्षेत्रीय जल में तीन मील की सीमा का दावा करता है, जबकि स्पेन जिब्राल्टर के बंदरगाहों को छोड़कर सभी समुद्री क्षेत्रों पर अधिकार का दावा करता है। स्पेन का यह भी दावा है कि हवाई क्षेत्र पर ब्रिटेन ने अवैध रूप से कब्ज़ा कर लिया है।

o स्पेन पूरे जिब्राल्टर क्षेत्र पर ब्रिटेन की संप्रभुता का विरोध करता है।  स्पेन इस क्षेत्र के स्पेन के साथ ऐतिहासिक संबंधों की ओर इशारा करता है, क्योंकि जिब्राल्टर वर्ष 1492 से लेकर वर्ष 1713 में यूट्रेक्ट की संधि तक कैस्टिले साम्राज्य और बाद में स्पेन का हिस्सा था।

o यूट्रेक्ट की संधि 1713 में ब्रिटेन और फ्राँस के बीच हस्ताक्षरित एक शांति समझौता था।

o यह संधियों की एक शृंखला का हिस्सा था जिसने स्पेनिश उत्तराधिकार के युद्ध को समाप्त कर दिया, जो कि वर्ष 1701-1714 तक चला।

इस युद्ध में फ्राँस, ग्रेट ब्रिटेन, डच गणराज्य और ऑस्ट्रिया सहित कई यूरोपीय देश शामिल थे। 

फ्राँस हडसन की बे कंपनी को हुए नुकसान की भरपाई करने पर सहमत है।

फ्राँस ने हडसन खाड़ी पर ब्रिटिश दावे को मान्यता दी और मुख्य भूमि अकाडिया को ब्रिटेन को सौंप दिया।

ब्रिटेन ने जिब्राल्टर और मिनोर्का, स्पेनिश अमेरिका में मूल्यवान व्यापारिक रियायतें और वेस्टइंडीज़ में सेंट किट्स द्वीप का अधिग्रहण किया।


Saturday, May 25, 2024

जैव विविधता और पर्यावरण

सर्वाधिक ऊँचाई पर एकीकृत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन परियोजना

लद्दाख एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल बन गया है, जिसके चलते यहाँ अपशिष्ट उत्पादन में वृद्धि हुई है। अपशिष्ट उत्पादन में वृद्धि को देखते हुए लद्दाख नगरपालिका समिति ने अपनी सर्वोच्च एकीकृत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन परियोजना (Incorporated Strong Waste Administration Venture ISWMP) शुरू की है।

प्रमुख बिंदु क्या हैं?

इस परियोजना का उद्देश्य क्षेत्र में बढ़ती अपशिष्ट समस्या का प्रबंधन करना है।

पूर्व में उचित अपशिष्ट प्रबंधन योजना के अभाव में अपशिष्ट के ढेर लग जाते थे जिनके चलते दुर्घटनाएँ होती थीं।

अब नगरपालिका शहर को साफ-सुथरा रखने तथा अपशिष्ट को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने का प्रयास कर रही है।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन परियोजना लद्दाख में अपशिष्ट चुनौती से निपटने हेतु एक सराहनीय पहल है।

वर्ष 2025 में भारत के शहरी क्षेत्रों में अपशिष्ट उत्पादन प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 0.7 किलोग्राम (वर्ष 1999 की तुलना में लगभग चार से छह गुना अधिक) होने की संभावना है।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार, वर्तमान में भारत प्रत्येक वर्ष  62 मिलियन टन अपशिष्ट (पुनर्चक्रण योग्य और गैर-पुनर्चक्रण योग्य दोनों) उत्पन्न करता है, जिसकी औसत वार्षिक वृद्धि दर 4% है।

उपभोग के परिवर्तित स्वरुप और तीव्र आर्थिक विकास के कारण वर्ष 2030 तक ठोस अपशिष्ट उत्पादन के 165 मिलियन टन तक बढ़ने की संभावना है।

सर्वोच्च एकीकृत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन परियोजना (ISWMP) क्या है?

ISWM योजना एक पैकेज है जिसमें नीतियाँ (नियामक, राजकोषीय, आदि), प्रौद्योगिकी (बुनियादी उपकरण और परिचालन) स्वैच्छिक उपाय (जागरूकता बढ़ाना, स्व-विनियमन) सहित एक प्रबंधन प्रणाली शामिल है।

एक प्रबंधन प्रणाली में अपशिष्ट प्रबंधन के सभी पहलुओं जैसे अपशिष्ट उत्पादन से लेकर उसके संग्रहण, स्थानांतरण, परिवहन, छँटाई, उपचार और निपटान शामिल है।

यह अपशिष्ट के बारे में आँकड़े एवं जानकारी प्रदान करता है, जैसे कि किस प्रकार और कितना उत्पादन किया जा रहा है तथा वर्तमान अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों को समझना ,प्रभावी, स्थान-विशिष्ट अपशिष्ट प्रबंधन योजना निर्माण के लिये आवश्यक है।

अपशिष्ट उपचार कैसे किया जाता है?

लैंडफिल:

o गैर-पुनर्चक्रण योग्य और गैर-निम्नीकरणीय अपशिष्ट का निपटान लैंडफिल में किया जाता है।

o आधुनिक लैंडफिल में पर्यावरण प्रदूषण को कम करने के लिये लाइनर का उपयोग करना और अन्य उपाय शामिल हैं।

भस्मीकरण(burning):

o कुछ क्षेत्र अपशिष्ट को जलाने के लिये भस्मीकरण प्रक्रिया का उपयोग करते हैं, जिससे इसकी मात्रा कम हो जाती है और ऊर्जा उत्पन्न होती है।

o हालाँकि यह विधि पर्यावरण और वायु गुणवत्ता संबंधी चिंताओं को बढ़ाती है।

खाद निर्माण:

o पोषक तत्त्वों से भरपूर मृदा निर्माण के लिये जैविक अपशिष्ट, जैसे कि खाद्य और यार्ड अपशिष्ट को कम्पोस्ट किया जा सकता है।

अपशिष्ट प्रबंधन से संबंधित पहल क्या हैं?

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिये स्वच्छ भारत मिशन:

o इस योजना के दिशा-निर्देशों के अनुसार, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन सहित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिये स्वच्छ भारत मिशन के तहत केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है।

केंद्र सरकार ने "अपशिष्ट मुक्त शहर" बनाने के समग्र दृष्टिकोण के साथ वर्ष 2021 में स्वच्छ भारत मिशन शहरी 2.0 (SBM-U 2.0) लॉन्च किया, जिसका लक्ष्य सभी शहरी स्थानीय निकायों को कम-से-कम 3-स्टार प्रमाणित किया जाना है (जैसा कि अपशिष्ट मुक्त शहरों के लिये प्रति स्टार रेटिंग प्रोटोकॉल) जिसमें घर-घर जाकर संग्रहण, स्रोत पृथक्करण और नगरपालिका ठोस अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रसंस्करण शामिल है।

यह मिशन स्रोत पृथक्करण, एकल-उपयोग प्लास्टिक को कम करने, निर्माण और विध्वंस गतिविधियों से अपशिष्ट का प्रबंधन करने तथा परंपरागत अपशिष्ट डंप साइटों के जैव-उपचार पर केंद्रित है।

o स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण चरण II के तहत, पेयजल और स्वच्छता विभाग ने राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को परिचालन दिशा-निर्देश जारी किये हैं जिनमें ग्रामीण स्तर पर ठोस अपशिष्ट प्रबंधन गतिविधियाँ शामिल हैं।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016:

o ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 ने नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (प्रबंधन और प्रहस्तन) नियम, 2000 को प्रतिस्थापित कर दिया है। वे स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण पर ज़ोर देते हैं, निर्माताओं को स्वच्छता और पैकेजिंग अपशिष्ट के निपटान के लिये ज़िम्मेदार बनाते हैं एवं बड़े अपशिष्ट जनरेटर से संग्रह, निपटान व प्रसंस्करण के लिये उपयोगकर्त्ता शुल्क पेश करते हैं।