Saturday, August 26, 2023

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा

 

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा

हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) द्वारा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF) जारी की गई, जिससे राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के नियमों के तहत शिक्षा प्रणाली में महत्त्वपूर्ण सुधार हुए। 

  • राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (National  Curriculum Framework- NCF) केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के तहत कक्षा 3 से कक्षा 12 तक के विद्यार्थियों के लिये शैक्षिक परिदृश्य को नया आकार देते हुए भाषा सीखने, विषय संरचना, मूल्यांकन रणनीतियों और पर्यावरण शिक्षा में बदलाव पेश करती है।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा की मुख्य विशेषताएँ:

  • भाषा सीखना:
    • कक्षा 9 और 10 के विद्यार्थी तीन भाषाएँ सीखते हैं, जिनमें से कम-से-कम दो मूल भारतीय भाषाएँ होती हैं।
    • कक्षा 11 और 12 में दो भाषाएँ पढ़ाई जाएंगी, जिनमें एक भारतीय मूल की होगी।
      • कम-से-कम एक भारतीय भाषा में भाषायी क्षमता का "साहित्यिक स्तर" हासिल करने का लक्ष्य है।
  • बोर्ड परीक्षा और मूल्यांकन:
    • यह विद्यार्थियों/छात्रों को एक स्कूल वर्ष (School Year) में कम-से-कम दो बार पर बोर्ड परीक्षा देने की अनुमति देता है।
      • दी गई परीक्षाओं में से केवल सर्वोत्तम स्कोर को ही बरकरार रखा जाएगा।
  • NEP 2020 के साथ संरेखण:
    • राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा NEP 2020 के दिशा-निर्देशों के अनुसार है। यह CBSE के तहत ग्रेड 3 से 12 तक नई पाठ्य-पुस्तकें तैयार करने हेतु आवश्यक रूपरेखा प्रदान करती है।
      • कक्षा 3 से 12 के लिये पाठ्य-पुस्तकों को 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना।
      • दूरदर्शिता और वर्तमान संदर्भ में समन्वय सुनिश्चित करने पर ध्यान देना
  • अनिवार्य एवं वैकल्पिक विषयों में परिवर्तन:
    • इससे पहले कक्षा 9 से 12 तक के छात्रों के लिये पाँच अनिवार्य विषय और एक अतिरिक्त विषय लेने का विकल्प रहता था।
      • अब कक्षा 9 और 10 के लिये अनिवार्य विषयों की संख्या सात है तथा कक्षा 11 एवं 12 के लिये छह है।
  • वैकल्पिक विषय:
    • पहले समूह में कला शिक्षा, शारीरिक शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा सम्मिलित है।
    • दूसरे समूह में सामाजिक विज्ञान, मानविकी और अंतःविषय जैसे क्षेत्र सम्मिलित हैं।
    • तीसरे समूह में विज्ञान, गणित और कंप्यूटेशनल सोच (Computational Thinking) सम्मिलित है।
  • छात्रों के लिये विकल्प की सुविधा:
    • अधिक लचीलापन और विकल्प प्रदान करने के लिये ‘माध्यमिक चरण’ को पुनः डिज़ाइन किया गया।
    • शैक्षणिक और व्यावसायिक विषयों या विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कला और शारीरिक शिक्षा जैसे विषयों में कोई बड़ा अंतर नहीं होगा।
    • विद्यार्थी अपने स्कूल छोड़ने के प्रमाणपत्र के लिये विषयों का दिलचस्प संयोजन चुन सकते हैं।
  • पर्यावरण शिक्षा:
    • पर्यावरण जागरूकता और स्थिरता पर ज़ोर दिया जाएगा।
    • पर्यावरण शिक्षा को स्कूली शिक्षा के सभी चरणों में एकीकृत किया गया है।
    • माध्यमिक चरण में पर्यावरण शिक्षा के लिये अलग से अध्ययन क्षेत्र होगा।
  • सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम के लिये सामग्री वितरण (कक्षा 6-8):
    • 20% विषयवस्तु स्थानीय स्तर की होगी।
    • 30% विषयवस्तु क्षेत्रीय स्तर की होगी।
    • 30% विषयवस्तु राष्ट्रीय स्तर की होगी।
    • वैश्विक स्तर की 20% विषयवस्तु होगी।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा:

  • परिचय: 
    • NCF नई शिक्षा नीति (New Education Policy- NEP) 2020 के प्रमुख घटकों में से एक है, जो NEP 2020 के उद्देश्यों, सिद्धांतों और दृष्टिकोण से सूचित इस परिवर्तन को सक्षम एवं सुनिश्चित करती है।
    • NCF में पहले चार संशोधन वर्ष 1975, 1988, 2000 और 2005 में हो चुके हैं। यदि प्रस्तावित संशोधन लागू होता है, तो यह ढाँचे का पाँचवा संशोधन होगा।
  • NCF के चार खंड:
  • उद्देश्य:
    • इसका उद्देश्य शिक्षाशास्त्र सहित पाठ्यक्रम में सकारात्मक बदलावों के माध्यम से NEP 2020 में परिकल्पित भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली को सकारात्मक रूप से बदलने में मदद करना है।
    • इसका उद्देश्य भारत के संविधान द्वारा परिकल्पित समतामूलक, समावेशी और बहुलवादी समाज को साकार करने के अनुरूप सभी बच्चों को उच्चतम गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान  करना है।

Thursday, August 24, 2023



चर्चा में क्यों? 

चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट-लैंडिंग करने वाला पहला मिशन बनकर चंद्रयान-3 ने इतिहास रच दिया है, दक्षिणी ध्रुव एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी पहले कभी खोज नहीं की गई थी। इस मिशन का उद्देश्य सुरक्षित और सहज चंद्र लैंडिंग, रोवर गतिशीलता और अंतःस्थाने वैज्ञानिक प्रयोगों का प्रदर्शन करना था।

  • भारत अब संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन के साथ चंद्रमा पर सफलतापूर्वक लैंडिंग करने वाले कुछ देशों में शामिल हो गया है।

पिछले मिशन में उत्पन्न बाधाएँ और चंद्रयान-3:

  • वर्ष 2019 में चंद्रयान-2 मिशन की लैंडिंग में विफलता के बाद अब चंद्रयान-3 ने सफल लैंडिंग की है
    • चंद्रमा पर उतरते समय नियंत्रण और संचार खो देने के कारण चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर चंद्रमा की सतह पर क्षतिग्रस्त हो गया था।
  • चंद्रयान-3 में भविष्य की समस्याओं का पूर्वानुमान लगाने और उनका समाधान करने के लिये चंद्रयान-2 मिशन से सीखे गए सबक से "विफलता-आधारित" डिज़ाइन रणनीति का उपयोग किया गया।
    • महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों में लैंडर के पैरों को मज़बूत करना, ईंधन भंडार बढ़ाना और लैंडिंग साइट के लचीलेपन को बढ़ाना शामिल था।

चंद्रयान-3 की लैंडिंग के बाद के अपेक्षित कदम:

  • चंद्रयान-3 के चंद्रमा की सतह पर कम-से-कम एक चंद्र दिवस (पृथ्वी के 14 दिन) तक संचालित होने की अपेक्षा है।
    • प्रज्ञान रोवर लैंडिंग स्थल के चारों ओर 500 मीटर के दायरे में घूमेगा, परीक्षण करेगा और लैंडर को डेटा एवं छवियाँ भेजेगा।
    • विक्रम लैंडर डेटा और छवियों को ऑर्बिटर तक प्रसारित करेगा, जो फिर उन्हें पृथ्वी पर भेज देगा।
    • लैंडर और रोवर मॉड्यूल सामूहिक रूप से उन्नत वैज्ञानिक पेलोड से सुसज्जित हैं।
      • इन उपकरणों को चंद्रमा की  विशेषताओं के विभिन्न पहलुओं की व्यापक जाँच करने के लिये डिज़ाइन किया गया है, जिसमें उस क्षेत्र का विश्लेषण, खनिज संरचना, सतह रसायन विज्ञान, वायुमंडलीय गुण और महत्त्वपूर्ण रूप से पानी एवं संभावित संसाधन जलाशयों की खोज शामिल है।मेट्र
      • प्रणोदन मॉड्यूल जो लैंडर और रोवर कॉन्फिगरेशन को 100 किमी. चंद्रमा की कक्षा तक ले गया, उसमें चंद्रमा की कक्षा से पृथ्वी के वर्णक्रमीय और पोलरिमेट्री माप का अध्ययन करने के लिये स्पेक्ट्रो-पोलरिमेट्री ऑफ हैबिटेबल प्लैनेट अर्थ (SHAPE) पेलोड भी है।भविष्य के ISRO के अभियान:
  • चंद्रयान-4: चंद्रमा के विकास के पथ पर आगे बढ़ना।
    • पिछले मिशनों के आधार पर आने वाले समय में नमूना वापसी मिशन के लिये चंद्रयान-4 को भी भेजा जा सकता है।
      • सफल होने पर यह चंद्रयान-2 और 3 के बाद अगला तार्किक कदम हो सकता है, जो चंद्र सतह के नमूनों को पुनः प्राप्त करने की क्षमता प्रदान करेगा।
    • यह मिशन चंद्रमा की संरचना और इतिहास के बारे में हमारी समझ को विस्तृत करने में मदद करेगा।
  • LUPEX: लूनर पोलर एक्सप्लोरेशन (Lunar Polar Exploration mission-LUPEX) मिशन, ISRO और JAXA (जापान) के बीच एक सहयोगात्मक प्रयास है जो चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों का पता लगाने में मदद करेगा।
    • इसे विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों को ढूँढने के लिये डिज़ाइन किया जाएगा जो स्थायी रूप से छायांकित क्षेत्र हैं।
    • पानी की उपस्थिति की खोज करना और एक स्थायी दीर्घकालिक स्टेशन की क्षमता का आकलन करना LUPEX के उद्देश्यों में से एक है।
  • आदित्य एल1:  यह सूर्य का अध्ययन करने वाला पहला अंतरिक्ष आधारित भारतीय मिशन होगा।
    • अंतरिक्ष यान को सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के लाग्रांज बिंदु 1 (Lagrange point 1, L1) के चारों ओर एक प्रभामंडल कक्षा में रखा जाएगा, जो पृथ्वी से लगभग 1.5 मिलियन किमी. दूर है।
    • सूर्य के कोरोना, उत्सर्जन, सौर हवाओं, ज्वालाओं और कोरोनल द्रव्यमान उत्सर्जन का अवलोकन करना आदित्य-एल1 का प्राथमिक उद्देश्य है।
  • एक्स-रे ध्रुवणमापी उपग्रह (X-ray Polarimeter Satellite- XPoSat): यह चरम स्थितियों में उज्ज्वल खगोलीय एक्स-रे स्रोतों की विभिन्न गतिशीलता का अध्ययन करने वाला भारत का पहला समर्पित ध्रुवणमापी मिशन होगा।
    • अंतरिक्ष यान पृथ्वी की निचली कक्षा में दो वैज्ञानिक पेलोड ले जाएगा।
  • NISAR:  NASA-ISRO सिंथेटिक एपर्चर रडार (NISAR) एक निम्न पृथ्वी कक्षा (Low Earth Orbit- LEO) वेधशाला है जिसे NASA और ISRO द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया जा रहा है।
    • NISAR 12 दिनों में पूरे विश्व का मानचित्रण करेगा तथा पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र, आइस मास (Ice Mass), वनस्पति बायोमास, समुद्र स्तर में वृद्धि, भूजल और भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी एवं भूस्खलन सहित प्राकृतिक खतरों में परिवर्तन को समझने के लिये स्थानिक तथा अस्थायी रूप से सुसंगत डेटा प्रदान करेगा।
  • गगनयान: गगनयान मिशन का उद्देश्य मनुष्यों को अंतरिक्ष में भेजना और उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाना है। इस मिशन में दो मानवरहित उड़ानें और एक मानवयुक्त उड़ान शामिल होगी, जिसमें GSLV Mk III लॉन्च व्हीकल और एक ह्यूमन-रेटेड ऑर्बिटल मॉड्यूल का उपयोग किया जाएगा।
    • मानवयुक्त उड़ान एक महिला सहित तीन अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की निचली कक्षा में सात दिनों के लिये ले जाएगी।
  • शुक्रयान 1यह सूर्य से दूसरे ग्रह शुक्र पर एक ऑर्बिटर भेजने हेतु नियोजित मिशन है। इसमें शुक्र की भू-वैज्ञानिक तथा ज्वालामुखीय गतिविधि, ज़मीन पर उत्सर्जन, वायु की गति, मेघ आवरण तथा ग्रह संबंधी अन्य विशेषताओं का अध्ययन किये जाने की अपेक्षा है।

Tuesday, August 22, 2023

 


 

भारतीय हिमालयी क्षेत्र से जुड़ी चुनौतियाँ चर्चा में क्यों? 

अपने मनोरम वातावरण और सांस्कृतिक विरासत के लिये प्रसिद्ध हिमालय क्षेत्र के स्वच्छता संबंधी मुद्दों को त्वरित रूप से हल किये जाने की आवश्यकता है, अवैध निर्माण और पर्यटकों की बढ़ती संख्या के कारण स्थिति  दिन-पर-दिन चिंतनीय होती जा रही है।

  • सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरनमेंट ने एक हालिया विश्लेषण में हिमालयी राज्यों में स्वच्छता प्रणालियों की गंभीर स्थिति पर प्रकाश डाला है।

विश्लेषण के प्रमुख बिंदु: 

  • जल आपूर्ति और अपशिष्ट जल उत्पादन: स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण के दिशा-निर्देशों के अनुसार, प्रत्येक पहाड़ी शहर में प्रति व्यक्ति लगभग 150 लीटर पानी की आपूर्ति की जाती है।
    • चिंता की बात यह है कि इस जल आपूर्ति का लगभग 65-70% अपशिष्ट जल में परिवर्तित हो जाता है।
  • धूसर जल प्रबंधन चुनौतियाँ: उत्तराखंड में केवल 31.7% घर सीवरेज सिस्टम से जुड़े हैं, जिस कारण अधिकांश लोग ऑन-साइट स्वच्छता सुविधाओं (एक स्वच्छता प्रणाली जिसमें अपशिष्ट जल को उसी भू-खंड पर एकत्रित, संग्रहीत और/या उपचारित किया जाता है जहाँ वह उत्पन्न होता है) पर निर्भर हैं।
    • घरों और छोटे होटल दोनों ही द्वारा बाथरूम एवं रसोई से निकलने वाले गंदे जल के प्रबंधन के लिये अक्सर सोखने वाले गड्ढों (Soak Pits) का उपयोग किया जाता है।
    • कुछ कस्बों में खुली नालियों से गंदे जल का अनियमित प्रवाह होता है, जिससे इस जल का अधिक रिसाव ज़मीन में होने लगता है
  • मृदा और भूस्खलन पर प्रभाव: हिमालयी क्षेत्र की मृदा की संरचना, जिसमें चिकनी, दोमट और रूपांतरित शिस्ट, फिलाइट एवं गनीस शैलें शामिल हैं, स्वाभाविक रूप से कोमल होती है।
    • विश्लेषण के अनुसार, जल और अपशिष्ट जल का ज़मीन में अत्यधिक रिसाव, मृदा को नरम/कोमल बना सकता है जिससे भूस्खलन की संभावना अधिक होती है।

भारतीय हिमालयी क्षेत्र से संबंधित अन्य चुनौतियाँ: 

  • परिचय
    • भारतीय हिमालयी क्षेत्र 13 भारतीय राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नगालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा, असम और पश्चिम बंगाल) में 2500 किमी. तक विस्तृत है।
    • इस क्षेत्र में लगभग 50 मिलियन लोग रहते हैं, विविध जनसांख्यिकीय और बहुमुखी आर्थिक, पर्यावरणीय, सामाजिक तथा राजनीतिक प्रणालियाँ इन क्षेत्रों की विशेषता है।
      • ऊँची चोटियों, विशाल दृश्यभूमि, समृद्ध जैवविविधता और सांस्कृतिक विरासत के साथ भारतीय हिमालयी क्षेत्र लंबे समय से भारतीय उपमहाद्वीप एवं विश्व भर से आगंतुकों तथा तीर्थयात्रियों के लिये आकर्षण का केंद्र रहा है।
  • चुनौतियाँ: 
    • पर्यावरणीय क्षरण और वनों की कटाई: वनों की व्यापक कटाई भारतीय हिमालयी क्षेत्र की सबसे प्रमुख समस्या रही है, यह पारिस्थितिक संतुलन पर काफी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
      • बुनियादी ढाँचे और शहरीकरण के लिये बड़े पैमाने पर होने वाले निर्माण कार्य से निवास स्थान का नुकसानमृदा का क्षरण और प्राकृतिक जल प्रवाह में बाधा जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
    • जलवायु परिवर्तन और आपदाएँ: भारतीय हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। बढ़ते तापमान का हिमनदों पर अधिक बुरा असर पड़ा है जिससे निचले इलाकों में रहने वाले समुदायों के लिये जल संसाधनों की उपलब्धता पैटर्न में बदलाव देखा जा रहा है।
      • अनियमित मौसम पैटर्न, वर्षा की तीव्रता में वृद्धि और दीर्घकालीन शुष्क मौसम पारिस्थितिक तंत्र स्थानीय समुदायों को और अधिक प्रभावित करते हैं।
      • यह क्षेत्र भूकंपभूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति भी अतिसंवेदनशील है।
        • गैर-योजनाबद्ध विकास, आपदा-रोधी बुनियादी ढाँचे की कमी एवं अपर्याप्त प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों के कारण इस प्रकार की घटनाओं के प्रभाव में और वृद्धि होती है।
    • सांस्कृतिक और स्वदेशी ज्ञान का पतन: भारतीय हिमालयी क्षेत्र पीढ़ियों से कायम रखे हुए अद्वितीय ज्ञान और प्रथाओं वाले विविध स्वदेशी समुदायों का घर है।
      • हालाँकि आधुनिकीकरण के कारण धारणीय संसाधन प्रबंधन हेतु मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करने वाली इन सांस्कृतिक परंपराओं का क्षरण हो सकता है।

Sunday, August 20, 2023


    कावेरी जल विवाद, चर्चा में क्यों? 

    • कावेरी जल विवाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है, क्योंकि तमिलनाडु ने कर्नाटक द्वारा अपने जलाशय के जल से 24,000 क्यूबिक फीट प्रति सेकंड (क्यूसेक) का प्रवाह सुनिश्चित करने में हस्तक्षेप के लिये भारत के सर्वोच्च न्यायालय से अपील की है।
    • तमिलनाडु ने न्यायालय से कर्नाटक को कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के फरवरी 2007 के अंतिम फैसले के अनुसार सितंबर 2023 के लिये निर्धारित 36.76 TMC (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) का प्रवाह सुनिश्चित करने का निर्देश देने का भी आग्रह किया, जिसे 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने संशोधित किया था। 
    • तमिलनाडु की सर्वोच्च न्यायालय से अपील:

      • यह मुद्दा कर्नाटक द्वारा पहले से व्यक्त सहमति के अनुसार जल की मात्रा छोड़ने से इनकार करने से उत्पन्न हुआ।
        • तमिलनाडु निर्धारित 15 दिन की अवधि के लिये 10,000 क्यूसेक जल छोड़ने का समर्थन करता है। दूसरी ओर, कर्नाटक ने समान 15 दिन की समय-सीमा के लिये 8,000 क्यूसेक जल कम करने का सुझाव दिया है।
    • कर्नाटक का स्पष्टीकरण:
      • कर्नाटक कावेरी जलग्रहण क्षेत्र में कम वर्षा के कारण कम प्रवाह का हवाला देता है, जिसमें उद्गम बिंदु कोडागु भी शामिल है।
        • कर्नाटक ने जून से अगस्त तक कोडागु में 44% वर्षा की कमी को बात कही है।
      • कर्नाटक ने तमिलनाडु की संकट-साझाकरण फार्मूले की मांग को खारिज कर दिया।
    • आशय:
      • तमिलनाडु के किसान कर्नाटक की प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रहे हैं, क्योंकि मेट्टूर जलाशय में केवल 20 TMC जल एकत्रित है, जो दस दिनों तक रहता है।
      • इस जटिल विवाद को सुलझाने में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अहम है।
      • न्यायसंगत जल प्रबंधन और संघर्ष समाधान के लिये सहयोगात्मक समाधान महत्त्वपूर्ण है।

    कावेरी जल विवाद: 

    • एक सावधानीपूर्वक तैयार की गई मासिक अनुसूची कावेरी बेसिन के दो तटवर्ती राज्यों कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच जल के वितरण को नियंत्रित करती है।
      • कर्नाटक के लिये "सामान्य" जल वर्ष के दौरान जून से मई तक तमिलनाडु को 177.25 हज़ार मिलियन क्यूबिक फीट जल साझा करना अनिवार्य है।
      • इस वार्षिक कोटा में जून से सितंबर तक मानसून महीनों के दौरान आवंटित 123.14 हज़ार मिलियन क्यूबिक फीट जल शामिल है।
    • मौजूदा दक्षिण-पश्चिम मानसून के मौसम में अक्सर जल विवाद उत्पन्न होता है, विशेषकर जब बारिश उम्मीद से कम होती है।

    कावेरी नदी विवाद : 

    • कावेरी नदी: 
      • इसे तमिल में 'पोन्नी' कहा जाता है और यह दक्षिण भारत की एक पवित्र नदी है।
      • यह दक्षिण-पश्चिमी कर्नाटक राज्य के पश्चिमी घाट की ब्रह्मगिरि पहाड़ी से निकलती है, कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्यों से होकर दक्षिण-पूर्व की ओर बहते हुए बड़े झरनों के रूप में पूर्वी घाट से उतरकर पुद्दुचेरी के माध्यम से बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
      • बाएँ तट की सहायक नदियाँ: अर्कावती, हेमावती, शिमसा और हरंगी।
      • दाहिने किनारे की सहायक नदियाँ: लक्ष्मणतीर्थ, सुवर्णवती, नोयिल, भवानी, काबिनी और अमरावती।

    • विवाद: 
      • चूँकि कावेरी नदी कर्नाटक से निकलती है, केरल से आने वाली प्रमुख सहायक नदियों के साथ तमिलनाडु से होकर बहती है तथा पुद्दुचेरी के माध्यम से बंगाल की खाड़ी में गिरती है, इसलिये इस विवाद में 3 राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश शामिल हैं।
      • यह विवाद 150 वर्ष पुरान है, यह वर्ष 1892 और 1924 में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी तथा मैसूर के बीच मध्यस्थता के दो समझौतों से संबंधित है।
      • इसमें निहित है कि किसी भी निर्माण परियोजना, जैसे कावेरी नदी पर जलाशय का निर्माण, के लिये ऊपरी तटवर्ती राज्य को निचले तटवर्ती राज्य की अनुमति लेना अनिवार्य है।
      • कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी जल विवाद 1974 में शुरू हुआ जब कर्नाटक ने तमिलनाडु की सहमति के बिना पानी मोड़ना शुरू कर दिया।
        • कई वर्षों के बाद इस मुद्दे को हल करने के लिये वर्ष 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण की स्थापना की गई। 17 वर्षों के बाद CWDT ने अंततः वर्ष 2007 में एक अंतिम निर्णय जारी किया जिसमें कावेरी जल को चार तटवर्ती राज्यों के बीच विभाजित करने के बारे में बताया गया। इसमें निर्णय लिया गया कि संकट के वर्षों में जल का बँटवारा आनुपातिक आधार पर किया जाएगा।
        • CWDT ने फरवरी 2007 में अपना अंतिम निर्णय जारी किया, जिसमें सामान्य वर्ष में 740 TMC की कुल उपलब्धता पर विचार करते हुए कावेरी बेसिन में चार राज्यों के मध्य जल आवंटन निर्दिष्ट किया गया था।
          • चार राज्यों के मध्य जल का आवंटन इस प्रकार है: तमिलनाडु- 404.25 TMC, कर्नाटक- 284.75 TMC, केरल- 30 TMC, और पुडुचेरी- 7 TMC।
        • वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने कावेरी को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया, साथ ही  बड़े पैमाने पर CWDT द्वारा निर्धारित जल-बँटवारे की व्यवस्था को बरकरार रखा।
          • इसने केंद्र को कावेरी प्रबंधन योजना को अधिसूचित करने का भी निर्देश दिया। 
          • केंद्र सरकार ने जून 2018 में 'कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण' और 'कावेरी जल विनियमन समिति' का गठन करते हुए 'कावेरी जल प्रबंधन योजना' को अधिसूचित किया।